पेलेट आप बनाते हैं, जलाता बिजलीघर है — कार्बन क्रेडिट किसे मिलेगा?
आप पराली ख़रीदते हैं, पेलेट बनाते हैं और किसी दूसरी कंपनी के कोयला बिजलीघर को बेचते हैं। तो कार्बन की बचत किसकी हुई — आपकी या बिजलीघर की? भारत में आज का सीधा जवाब सुनने में अच्छा नहीं लगता, और उसका इससे कोई लेना-देना नहीं कि मेहनत किसकी ज़्यादा है।
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- पूरी बात एक ही सवाल पर टिकी है — चिमनी किसकी है?
- तो ठीक है, बिजलीघर को मिल जाता होगा?
- अनिवार्यता ही क्रेडिट को खा जाती है
- बिजलीघर को असल में मिलता क्या है
- फिर भी समझौते में लिखवाना चाहिए?
- पेलेट के कारोबार में कार्बन का पैसा असल में कहाँ है
- उन्हें बेचिए जिन्हें कोई मजबूर नहीं कर रहा
- सप्लायर मत रहिए, प्रोजेक्ट के मालिक बनिए
- देखिए कि आपके ख़रीदार कौन हैं
- और वह पराली, जो वैसे जल जाती?
- जो पैसा आज सच में सामने रखा है
- छोटी बात
तुरंत जवाब
मैं पेलेट बनाकर बिजलीघर को बेचता हूँ — कार्बन क्रेडिट मुझे मिलेगा या उसे?
आपको नहीं — और भारत में ज़्यादातर मामलों में बिजलीघर को भी नहीं।
कार्बन की बचत उस घड़ी होती है जब कोयला नहीं जलता। वह घड़ी बिजलीघर के बॉयलर में आती है, उसके मीटर पर दर्ज होती है, उसी के हिसाब-किताब से टन घटता है। आपने ईंधन बेचा। दुनिया की हर रजिस्ट्री का नियम एक ही है — बचत उसकी, जिसके अहाते में हुई।
पर बिजलीघर भी उसे बेच नहीं सकता, क्योंकि कोयला बिजलीघरों के लिए 5 से 7 प्रतिशत बायोमास जलाना अब अनिवार्य है। कार्बन क्रेडिट सिर्फ़ उस बदलाव का पैसा देता है जो वैसे होता ही नहीं। जो कानून पहले से करा रहा है, वह बदलाव नहीं कहलाता।
अगस्त 2026 तक के आँकड़े। 1.2 टन वाला अनुपात बिजली मंत्रालय के बताए जोड़ से निकला है — लगभग 8,14,000 टन बायोमास के साथ लगभग 9.7 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड की बचत।
पूरी बात एक ही सवाल पर टिकी है — चिमनी किसकी है?
कार्बन क्रेडिट मेहनत देखकर नहीं मिलता। वह उसे मिलता है जिसके हिसाब-किताब में बचत दर्ज होती है। नियमों में इसे प्रोजेक्ट की हद कहते हैं, और यह हद मशीनों के चारों ओर खींची जाती है — नीयत या मेहनत के चारों ओर नहीं।
तो खींचकर देखिए। वह एक टन कार्बन डाइऑक्साइड ठीक-ठीक कहाँ जाकर ख़त्म होती है?
आपकी पेलेट मिल में तो नहीं। आपकी मिल तो ख़ुद धुआँ छोड़ती है — पराली ढोती ट्रॉलियों का डीज़ल, हैमर मिल और डाई चलाने की बिजली, और फिर बिजलीघर के गेट तक ट्रक का डीज़ल। वहाँ कुछ नहीं बचता। बचत उस घड़ी होती है जब बॉयलर आपका पेलेट जलाता है और उतना कोयला ज़मीन के नीचे ही रह जाता है।
वह बॉयलर बिजली कंपनी का है। जो कोयला उसने नहीं ख़रीदा वह भी उसी का, उसे साबित करने वाला मीटर भी उसी का, और जिस हिसाब से वह टन घटता है वह भी उसी का। आपने एक कंपनी को ईंधन बेचा, और फ़ैसला उसने किया। क्रेडिट फ़ैसले के साथ बैठता है।
नियम, एक लाइन में
बचत का साधन बेच देना उस बचत को कर देने के बराबर नहीं है।
किसान सोलर पंप पर आ जाए, तो डीज़ल बेचने वाले को क्रेडिट नहीं मिलता। बिजलीघर थोड़ा कोयला कम जलाए, तो पेलेट बेचने वाले को नहीं मिलता। दोनों जगह एक ने सामान बेचा, और आदत किसी और ने बदली।
यह कोई तकनीकी पेच नहीं है जिसे बहस से पार किया जा सके। यही नियम दो लोगों को एक ही टन पर दावा करने से रोकता है — इसे दोहरी गिनती कहते हैं, और प्रोजेक्ट रद्द होने या ख़रीदार के पीछे हटने की यह सबसे तेज़ वजह है। आप और बिजलीघर दोनों उसी टन का दावा करें, तो एक तो हवा बेच रहा है।
तो ठीक है, बिजलीघर को मिल जाता होगा?
कहने को हाँ। बिजलीघर प्रोजेक्ट का मालिक बनता, और उसके लिए बनी-बनाई नियम-किताब भी है — ACM0006, यानी बायोमास से बिजली और ऊष्मा, जो बिजलीघर में जलने वाले बायोमास का पुराना रास्ता है।
पर भारत में, 2026 में, ज़्यादातर नहीं। वजह दूसरा नियम है, और असल में यही पूरी बात काट देता है।
अनिवार्यता ही क्रेडिट को खा जाती है
बिजली मंत्रालय की संशोधित बायोमास नीति — 8 अक्टूबर 2021 को जारी और 16 जून 2023 को संशोधित — कोयला बिजलीघरों के लिए बायोमास जलाना अनिवार्य करती है: वित्त वर्ष 2024-25 से 5%, और 2025-26 से बढ़कर 7%। यह SAMARTH मिशन के तहत चलता है, जो जुलाई 2021 में इसीलिए शुरू हुआ था कि पराली खेत से निकलकर बॉयलर तक पहुँचे।
यही अनिवार्यता आपके कारोबार की जड़ है। और यही वजह है कि कार्बन क्रेडिट नहीं बनता।
वह कसौटी, जिस पर अनिवार्यता टूट जाती है
कार्बन क्रेडिट उस बचत का पैसा देता है जो क्रेडिट के पैसे के बिना होती ही नहीं। यही कसौटी है, और Verra, Gold Standard और भारत का अपना CCTS ऑफ़सेट तंत्र — तीनों इसे लगाते हैं।
जब कानून पहले से मजबूर कर रहा हो, तो काम क्रेडिट के पैसे से नहीं हुआ। बिजलीघर इसलिए जला रहा है कि उसे जलाना ही है। इसलिए अनिवार्य 5 से 7 प्रतिशत पर क्रेडिट बनता ही नहीं — न बिजलीघर को, और इसलिए आपको भी नहीं। जो हक़ कभी पैदा ही नहीं हुआ, वह आपको मिलेगा कहाँ से।
एक झिरी उस लकीर के ऊपर ज़रूर है। NTPC ने अनिवार्य हिस्से से कहीं आगे जाकर दिखाया है — टांडा की यूनिट 4 में 20% टॉरिफ़ाइड बायोमास — और तलवंडी साबो ने बड़े पैमाने पर टॉरिफ़ाइड पेलेट लिया है। अनिवार्य 7% से ऊपर की मात्रा कानून से बँधी नहीं है, इसलिए उस पर दलील बन सकती है।
पर ध्यान रखिए कि इससे क्या नहीं बदलता: वह अब भी बिजलीघर का प्रोजेक्ट है, उसकी हद में, उसके मीटर पर। झिरी चौड़ी होने से क्रेडिट बाड़ के इस पार, ईंधन बेचने वाले की तरफ़, नहीं आ जाता।
बिजलीघर को असल में मिलता क्या है
यह हिस्सा कारोबार के लिहाज़ से काम का है, क्योंकि इससे पता चलता है कि सामने बैठा ख़रीदार असल में क्या बचा रहा है — और इसलिए आप किस चीज़ का दाम माँग सकते हैं और किसका नहीं।
| बिजलीघर को क्या मिलता है | स्थिति | आपके लिए इसका मतलब |
|---|---|---|
| RPO में गिनती | असली। MNRE ने सितंबर 2019 में साफ़ किया कि बायोमास को-फ़ायरिंग से बनी बिजली नवीकरणीय है और ग़ैर-सौर RPO में गिनी जाएगी। CERC ने गिनने का तरीक़ा 13 अगस्त 2025 के आदेश क्रमांक 03 of 2025 में तय किया। | बिजलीघर का असली इनाम यही है, कार्बन नहीं। वह इसे आपको नहीं देगा। |
| जुर्माने से बचाव | असली और तीखा। दिसंबर 2025 में छह बिजलीघरों पर को-फ़ायरिंग का लक्ष्य चूकने पर लगभग ₹61.85 करोड़ का जुर्माना लगा। | भाव पर आपकी पकड़ यहीं है। टेंडर नियमों के दबाव से चलते हैं, हरियाली के जोश से नहीं। |
| CCTS वाले अनिवार्य क्रेडिट | मिलते ही नहीं। CCTS के जिन नौ क्षेत्रों पर अनिवार्य लक्ष्य हैं — एल्युमिनियम, सीमेंट, क्लोर-अल्कली, लुगदी व कागज़, लोहा-इस्पात, उर्वरक, पेट्रोलियम रिफ़ाइनरी, पेट्रोरसायन और कपड़ा — उनमें बिजली उत्पादन है ही नहीं। | पेलेट के भाव में "कार्बन" के नाम पर बढ़ोतरी मत जोड़िए। उधर कोई कार्बन की कमाई है ही नहीं जिससे वह चुकाई जाए। |
| बिकने लायक़ कार्बन क्रेडिट | अनिवार्य 5 से 7 प्रतिशत पर लगभग नामुमकिन। सिर्फ़ उससे ऊपर की मात्रा पर दलील बनती है। | जो चीज़ आपने पूछी, वह ज़्यादातर टनों पर किसी के लिए भी किसी क़ीमत की नहीं है। |
अगली बार भाव तय करने से पहले यह तालिका एक बार और पढ़ लीजिए। आपका ख़रीदार नियमों की पालना ख़रीद रहा है। वह RPO का आँकड़ा ख़रीद रहा है और जुर्माने की चिट्ठी न आना ख़रीद रहा है। ऐसा नहीं है कि उसके पास कार्बन की कमाई पड़ी है और वह हिस्सा देने से मुकर रहा है — कमाई है ही नहीं।
फिर भी समझौते में लिखवाना चाहिए?
हाँ। इसलिए नहीं कि अगले साल पैसा मिलेगा, बल्कि इसलिए कि इसमें ख़र्च कुछ नहीं है और एक दरवाज़ा खुला रह जाता है।
बाहर के बाज़ारों में ईंधन और बिजली के समझौतों में इसके लिए पर्यावरणीय अधिकार नाम की धारा होती है। वह इस पूरे कुनबे को नाम देती है — रिन्यूएबल एनर्जी सर्टिफ़िकेट, कार्बन क्रेडिट, CCTS के कार्बन क्रेडिट सर्टिफ़िकेट, और आगे कानून या किसी रजिस्ट्री से बनने वाला ऐसा कोई भी दस्तावेज़ — और फिर साफ़-साफ़ लिखती है कि मालिक कौन है।
समझौते में क्या डलवाइए
- परिभाषा चौड़ी रखिए। "पर्यावरणीय अधिकार" में REC, RPO का हक़, कार्बन क्रेडिट, CCC और आगे बनने वाला कोई भी दस्तावेज़ आ जाए — ताकि 2028 में नियम बदले तो 2026 का समझौता बीच में से न फट जाए।
- RPO छोड़ दीजिए, कार्बन रोक लीजिए। बिजलीघर ख़रीद ही RPO और जुर्माने से बचाव के लिए रहा है; उस पर अड़ना ऑर्डर गँवाना है। अनिवार्य हिस्से से ऊपर के कार्बन हक़ अलग बात है, और उसे अपने पास रखना या आधा-आधा करना बनता है।
- अपनी पराली वाली कड़ी अलग करा लीजिए। "इस बायोमास से जुड़े सारे पर्यावरणीय अधिकार" जैसी सरसरी धारा पर कभी दस्तख़त मत कीजिए। ऐसी भाषा पीछे खेत तक पहुँच जाती है और आगे चलकर आपके अपने जायज़ दावे रोक सकती है।
- आँकड़ों पर हक़ अपने पास रखिए। कितने टन, नमी कितनी, GCV कितना, किन गाँवों से आया, किस तारीख़ को उठा। कल को टिकाऊ बायोमास का प्रमाणन या पहचान-कड़ी अपने आप में बिकने लगे — और निर्यात के ख़रीदारों के लिए वह आज भी बिकती है — तो वही रिकॉर्ड आपकी पूँजी है, और वह सिर्फ़ आप बना सकते हैं।
पेलेट के कारोबार में कार्बन का पैसा असल में कहाँ है
यही हिस्सा करने लायक़ है। जो अनिवार्यता बिजलीघर पर क्रेडिट रोक देती है, वह और कहीं है ही नहीं। भारत का हर दूसरा कोयला जलाने वाला बॉयलर इस मामले में खुला है — और यही उसे क्रेडिट के लायक़ बनाता है।
उन्हें बेचिए जिन्हें कोई मजबूर नहीं कर रहा
एक कपड़ा मिल, एक कागज़ यूनिट, एक खाद्य प्रसंस्करण इकाई, एक रसायन कारख़ाना, एक डिस्टिलरी, एक ईंट भट्ठा — हर एक अपने बॉयलर में भाप बनाने के लिए कोयला या फ़र्नेस ऑयल जला रहा है। किसी कानून ने इनमें से किसी को बदलने को नहीं कहा। इनमें से कोई आपके पेलेट पर आता है, तो वह प्रोजेक्ट से हुआ असली बदलाव है, और जो दलील बिजलीघर पर टूट जाती है वह यहाँ खड़ी हो जाती है।
नियम-किताब का रास्ता जमा-जमाया है: CDM की AMS-III.B (ईंधन बदलना) भारत में ठीक इसी काम के लिए इस्तेमाल हुई है — एक रसायन कारख़ाने ने भाप बनाना बायोमास ब्रिकेट पर लाया और साल में लगभग 7,250 टन की बचत दर्ज हुई। भारत के अपने CCTS ऑफ़सेट तंत्र की सूची में भी औद्योगिक ईंधन परिवर्तन और बायोमास से बिजली-ऊष्मा दोनों शामिल हैं, बशर्ते प्रोजेक्ट 1 जनवरी 2025 या उसके बाद शुरू हुआ हो।
सप्लायर मत रहिए, प्रोजेक्ट के मालिक बनिए
पूरी बात का निचोड़ यही है। बिजलीघर पर आप ईंधन बेचने वाले हैं और क्रेडिट पहुँच से बाहर है। औद्योगिक बॉयलर पर आप ख़ुद प्रोजेक्ट के मालिक बन सकते हैं — बशर्ते बॉयलर बदलने का पैसा या काम आप करें, कई साल का ईंधन समझौता आपके नाम हो, मीटर आपकी पकड़ में हो, और रजिस्ट्री में प्रोजेक्ट आपके नाम दर्ज हो।
एक कारख़ाना वैलिडेशन और हर साल की जाँच का ख़र्च नहीं उठाएगा। एक ही कार्यक्रम में बँधे बीस ऐसे बॉयलर उठा लेंगे। जोड़ना ही कारोबार है — वही सोच, जिससे खेती के कार्बन प्रोजेक्ट में FPO चल पाता है।
देखिए कि आपके ख़रीदार कौन हैं
इनमें से कई उद्योग — कपड़ा, लुगदी और कागज़, उर्वरक, पेट्रोरसायन, सीमेंट — CCTS के उन्हीं क्षेत्रों में हैं जिन पर वित्त वर्ष 2025-26 और 2026-27 के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन-तीव्रता लक्ष्य हैं, और आधार वर्ष 2023-24 है। लगभग 740 इकाइयाँ इसमें आती हैं।
जो मिल अपना लक्ष्य चूकेगी, उसे सर्टिफ़िकेट ख़रीदने पड़ेंगे या हर्जाना भरना पड़ेगा। बॉयलर का ईंधन बदलने से उसका वही आँकड़ा सीधे सुधरता है। यानी ऐसा ख़रीदार जिसके पास आपको पेलेट के कैलोरी मान से ज़्यादा देने की कानूनी वजह है — और बिजलीघर के पास ठीक यही वजह नहीं है।
और वह पराली, जो वैसे जल जाती?
यह सवाल हर बार आता है, इसलिए सीधा जवाब: जलने से बचाने वाला दावा है तो सही, पर बहुत छोटा है और ज़्यादातर आपका है भी नहीं।
एक टन पराली जलने पर सिर्फ़ लगभग 0.08 टन के बराबर वे गैसें निकलती हैं जो सच में गिनी जाती हैं — उस धुएँ का ज़्यादातर कार्बन उसी फ़सल ने कुछ महीने पहले हवा से खींचा था, इसलिए वह आपस में कट जाता है। और एक फंदा भी है: आप उस पराली का पैसा दे रहे हैं, तो आपने ख़ुद साबित कर दिया कि वह जलने वाली नहीं थी। जिस पराली का ख़रीदार है, उसकी क़ीमत है।
पूरा हिसाब हमने पराली और कार्बन क्रेडिट वाले लेख में लगाया है। छोटी बात यह कि जितनी मात्रा असल में होती है, उस पर साल भर की जाँच का ख़र्च दावे से ज़्यादा बैठता है।
जो पैसा आज सच में सामने रखा है
बिजलीघर को पेलेट बेचने वाले के लिए कार्बन क्रेडिट के पीछे भागना ग़लत चीज़ है। ये सही चीज़ें हैं, और आज उपलब्ध हैं।
| योजना | क्या मिलता है | शर्तें जो जाननी ज़रूरी हैं |
|---|---|---|
| MNRE — राष्ट्रीय जैव ऊर्जा कार्यक्रम | बिना टॉरिफ़िकेशन वाले पेलेट प्लांट पर ₹21 लाख प्रति मीट्रिक टन प्रति घंटा क्षमता, या मशीनरी लागत का 30% — जो कम हो — अधिकतम ₹1.05 करोड़ प्रति प्रोजेक्ट। ब्रिकेट प्लांट पर ₹9 लाख प्रति MTPH, अधिकतम ₹45 लाख। टॉरिफ़ाइड प्लांट पर दर ऊँची है। | आवेदन बायोऊर्जा पोर्टल पर प्लांट चालू होने से पहले। 27 जून 2025 के संशोधित दिशानिर्देशों में पूरी मदद 10 घंटे लगातार 80% क्षमता उपयोग से बँधी है — उससे कम पर अनुपात में, और 50% से नीचे कुछ नहीं। |
| CPCB — पराली के पेलेट और टॉरिफ़िकेशन प्लांट | पेलेट बनाने पर एकमुश्त ₹14 लाख प्रति टन प्रति घंटा, अधिकतम ₹70 लाख प्रति प्रस्ताव; टॉरिफ़िकेशन पर ₹28 लाख प्रति TPH, अधिकतम ₹1.4 करोड़। | सिर्फ़ पराली, और सिर्फ़ दिल्ली, पंजाब, हरियाणा तथा राजस्थान और उत्तर प्रदेश के NCR ज़िलों की। पैसा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ज़रिए आता है। चलाने के ख़र्च पर कुछ नहीं। |
| RBI — प्राथमिकता क्षेत्र ऋण | बायोमास पेलेट बनाना प्राथमिकता क्षेत्र ऋण के लायक़ काम माना गया है। | इससे आपकी कार्यशील पूँजी सस्ती पड़ती है — दस साल में यह अक्सर उस क्रेडिट से ज़्यादा बैठता है जिसके पीछे आप भाग रहे थे। |
| SAMARTH की वेंडर सूची | बिजली मंत्रालय की सार्वजनिक वेंडर सूची में नाम, जो ख़रीद करने वाली बिजली कंपनियाँ देखती हैं। | टेंडर तक पहुँच। अकेले NTPC ने लाखों टन के टेंडर निकाले हैं। |
छोटी बात
बस इतना याद रखिए
- क्रेडिट बॉयलर के साथ जाता है, बिल के साथ नहीं। बचत वहाँ होती है जहाँ कोयला नहीं जलता — बिजलीघर की हद में। ईंधन बेच देने से वह हक़ आपके पास नहीं आता।
- अनिवार्य 5 से 7 प्रतिशत पर किसी को क्रेडिट नहीं मिलता। कानून पहले से करा रहा है, इसलिए वह "अतिरिक्त" नहीं है, इसलिए बनता ही नहीं — न बिजलीघर को, न आपको।
- आपके ख़रीदार के पास कार्बन की कमाई है ही नहीं। वह RPO और जुर्माने से बचाव ख़रीद रहा है। बिजली उत्पादन तो CCTS के अनिवार्य क्षेत्रों में भी नहीं है। भाव उसी हिसाब से तय कीजिए।
- फिर भी पर्यावरणीय अधिकार वाली धारा डलवाइए। RPO छोड़िए, अनिवार्य हिस्से से ऊपर का कार्बन रोकिए, अपनी पराली वाली कड़ी अलग कराइए, आँकड़े अपने पास रखिए। ख़र्च कुछ नहीं।
- असली मौक़ा बिजलीघर के बाहर है। जो औद्योगिक और कैप्टिव बॉयलर अपनी मर्ज़ी से कोयला छोड़ रहे हैं — कसौटी वहाँ खरी उतरती है, और वहाँ आप सप्लायर नहीं, प्रोजेक्ट के मालिक बन सकते हैं।
- जोड़िए, वरना रहने दीजिए। एक बॉयलर वैलिडेशन और हर साल की जाँच नहीं उठा सकता। बीस उठा लेंगे।
- जो मदद आज मौजूद है, वह लीजिए। MNRE की CFA, CPCB की मदद, प्राथमिकता क्षेत्र ऋण और SAMARTH की सूची — ये आज असली पैसा हैं, उस क्रेडिट के मुक़ाबले जो बन ही नहीं सकता।
पेलेट प्लांट चला रहे हैं, या लगाने की सोच रहे हैं, और जानना चाहते हैं कि कार्बन असल में कहाँ है? मुफ़्त जाँच के लिए कहिए। हम आपकी पराली, आपके ख़रीदार और आपके समझौते देखकर बताएँगे कि सच में क्या रजिस्टर हो सकता है — और अगर जवाब "कुछ नहीं" हुआ, तो वही कहेंगे।
अगस्त 2026 तक की जानकारी। यह आम जानकारी है — कानूनी, वित्तीय या नियामक सलाह नहीं। नीतियाँ, अनिवार्य प्रतिशत और सब्सिडी की दरें बदलती रहती हैं; कोई भी निवेश तय करने से पहले बिजली मंत्रालय, MNRE, CPCB और BEE की मौजूदा अधिसूचनाएँ देख लीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मैं बिजलीघर को पेलेट बेचता हूँ। कार्बन क्रेडिट मुझे मिलेगा क्या?
अपने आप नहीं मिलेगा। क्रेडिट उसी को मिलता है जिसके अपने अहाते में बचत होती है। बचत तब होती है जब बिजलीघर आपका पेलेट जलाकर उतना कोयला नहीं जलाता — यानी उसके बॉयलर में, उसके मीटर पर, उसके हिसाब-किताब में। आप ईंधन बेचने वाले हैं, और किसी को बचत का साधन बेच देना उस बचत को कर देने के बराबर नहीं है। यही नियम यह भी रोकता है कि एक ही टन का दावा दो लोग करें, जिसे दोहरी गिनती कहते हैं और जो प्रोजेक्ट रद्द होने की सबसे तेज़ वजह है।
तो कार्बन क्रेडिट बिजलीघर को मिल जाता है?
कहने को तो दावा उसी का बनता है, ACM0006 जैसी नियम-किताब के तहत। पर भारत में असल में उसे भी नहीं मिलता। बिजली मंत्रालय की संशोधित बायोमास नीति के तहत कोयला बिजलीघरों के लिए 5% को-फ़ायरिंग वित्त वर्ष 2024-25 से और 7% वित्त वर्ष 2025-26 से अनिवार्य है। कार्बन क्रेडिट सिर्फ़ उस बचत का पैसा देता है जो क्रेडिट के पैसे के बिना होती ही नहीं। जो काम कानून पहले से करा रहा है, वह इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता। इसलिए अनिवार्य हिस्से पर किसी को भी क्रेडिट जारी नहीं होता।
अनिवार्य 7% से ऊपर जो बायोमास जलता है, उसका क्या?
उतनी मात्रा कानून से बँधी नहीं है, इसलिए उस पर दलील बन सकती है — जैसे NTPC ने टांडा में 20% तक टॉरिफ़ाइड बायोमास जलाकर दिखाया है। पर इससे सिर्फ़ यह बदलता है कि दलील किसके पास है, यह नहीं कि क्रेडिट कहाँ बैठा है। वह अब भी बिजलीघर का प्रोजेक्ट है, उसके अहाते में, उसके मीटर पर। पेलेट बेचने वाले को वह हक़ फिर भी लिखित समझौते से ही मिलेगा।
क्या मैं अपने सप्लाई समझौते में कार्बन क्रेडिट का हक़ लिखवा सकता हूँ?
लिखवा सकते हैं, और लिखवाना भी चाहिए — पर समझ लीजिए कि मिल क्या रहा है। समझौते में 'पर्यावरणीय अधिकार' नाम की एक धारा डलवाइए, जिसमें रिन्यूएबल एनर्जी सर्टिफ़िकेट, कार्बन क्रेडिट, CCTS के कार्बन क्रेडिट सर्टिफ़िकेट और आगे बनने वाला कोई भी ऐसा दस्तावेज़ शामिल हो। RPO वाला हक़ छोड़ना पड़ेगा, क्योंकि बिजलीघर ख़रीद ही उसी के लिए रहा है और वह नहीं छोड़ेगा। अनिवार्य हिस्से से ऊपर का कार्बन हक़ अपने पास रखिए, और अपनी पराली वाली कड़ी को अलग करा लीजिए ताकि कोई सरसरी धारा आगे चलकर खेत की तरफ़ के दावे न रोक दे। ख़र्च कुछ नहीं, और नियम बदले तो बचाव रहेगा।
क्या बिजलीघर से कार्बन के नाम पर ऊँचा भाव माँगना चाहिए?
नहीं, क्योंकि उसके पास कार्बन की कमाई है ही नहीं जिसमें से वह आपको हिस्सा दे। बिजलीघर का फ़ायदा नियमों वाला है — बायोमास से बनी बिजली उसके ग़ैर-सौर RPO में गिनी जाती है, और को-फ़ायरिंग करने से जुर्माने से बचाव होता है, जो छोटा नहीं है। दिसंबर 2025 में छह बिजलीघरों पर लक्ष्य चूकने पर लगभग ₹61.85 करोड़ का जुर्माना लगा था। CCTS के जिन नौ क्षेत्रों पर अनिवार्य लक्ष्य हैं, उनमें बिजली उत्पादन है भी नहीं। इसलिए भाव कैलोरी मान, समय पर सप्लाई और उसके जुर्माने के दबाव पर तय कीजिए, कार्बन पर नहीं।
तो पेलेट बनाने वाले को कार्बन क्रेडिट कहाँ से मिल सकता है?
उन ख़रीदारों से जिन पर कोई कानूनी दबाव नहीं है। कपड़ा मिल, कागज़ यूनिट, खाद्य प्रसंस्करण, रसायन कारख़ाना, डिस्टिलरी, ईंट भट्ठा — ये सब अपने बॉयलर में भाप बनाने के लिए कोयला या फ़र्नेस ऑयल जलाते हैं और किसी कानून ने इन्हें बदलने को नहीं कहा। इनमें से कोई आपके पेलेट पर आता है, तो वह असली बदलाव है और वही कसौटी यहाँ पूरी हो जाती है जो बिजलीघर पर टूट जाती है। रास्ता है ईंधन बदलने वाली नियम-किताब, जैसे CDM की AMS-III.B, और भारत के अपने CCTS ऑफ़सेट तंत्र की सूची में औद्योगिक ईंधन परिवर्तन तथा बायोमास से बिजली और ऊष्मा दोनों शामिल हैं, बशर्ते प्रोजेक्ट 1 जनवरी 2025 या उसके बाद शुरू हुआ हो। सबसे बड़ी बात — यहाँ आप सप्लायर नहीं, ख़ुद प्रोजेक्ट के मालिक बन सकते हैं।
एक कारख़ाने के बॉयलर से कितने क्रेडिट बनेंगे?
अकेला कारख़ाना छोटा पड़ता है। भारत में रजिस्टर हुए एक छोटे ईंधन-परिवर्तन प्रोजेक्ट में, एक रसायन कारख़ाने की भाप बायोमास ब्रिकेट पर लाने से साल में लगभग 7,250 टन कार्बन डाइऑक्साइड की बचत हुई। इतने पर एक जगह अकेले वैलिडेशन और हर साल की बाहरी जाँच का ख़र्च नहीं उठा सकती। कारोबार तभी बनता है जब बीस या उससे ज़्यादा ऐसे बॉयलर एक ही प्रोजेक्ट में जोड़े जाएँ — वही जोड़ने वाली सोच, जिससे खेती के कार्बन प्रोजेक्ट में FPO चल पाता है।
पराली जलने से रोकने का कार्बन क्रेडिट मिलता है क्या?
बहुत कम, और असल में लगभग नहीं। एक टन पराली जलने पर सिर्फ़ लगभग 0.08 टन के बराबर वे गैसें निकलती हैं जो गिनी जाती हैं, क्योंकि उस धुएँ का ज़्यादातर कार्बन उसी फ़सल ने कुछ महीने पहले हवा से खींचा था। एक फंदा और है — अगर आप पराली का पैसा दे रहे हैं, तो यही साबित हो गया कि उसकी क़ीमत थी और वह जलने वाली नहीं थी। जितनी मात्रा आपके पास होगी, उस पर हर साल की जाँच का ख़र्च दावे से ज़्यादा बैठेगा।
एक टन पेलेट से कितनी कार्बन डाइऑक्साइड बचती है?
कोयले की जगह जलने पर लगभग 1.2 टन। यह बिजली मंत्रालय के अपने आँकड़ों से निकलता है — लगभग 8,14,000 टन बायोमास के साथ लगभग 9.7 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड की बचत जुड़ी बताई गई है। असली आँकड़ा आपके पेलेट और उस कोयले के कैलोरी मान पर टिका है। NTPC पेलेट का GCV 3,000 से 4,200 किलो कैलोरी प्रति किलो माँगता है, और 6,000 किलो कैलोरी वाले एक टन कोयले की बराबरी के लिए 3,800 वाले लगभग 1.14 टन पेलेट लगते हैं।
पेलेट प्लांट के लिए सरकार से क्या मदद मिलती है?
कई चीज़ें, और सब उस क्रेडिट से ज़्यादा क़ीमती हैं जो आपको मिल ही नहीं सकता। MNRE के राष्ट्रीय जैव ऊर्जा कार्यक्रम में बिना टॉरिफ़िकेशन वाले पेलेट प्लांट पर ₹21 लाख प्रति मीट्रिक टन प्रति घंटा क्षमता, या मशीनरी की लागत का 30% — जो कम हो — और एक प्रोजेक्ट पर अधिकतम ₹1.05 करोड़ मिलता है; ब्रिकेट प्लांट पर ₹9 लाख प्रति MTPH, अधिकतम ₹45 लाख। आवेदन बायोऊर्जा पोर्टल पर प्लांट चालू होने से पहले करना होता है, और 27 जून 2025 के संशोधित दिशानिर्देशों में पूरी मदद 80% क्षमता उपयोग से बँधी है। CPCB अलग से पराली के पेलेट प्लांट पर ₹14 लाख प्रति टन प्रति घंटा, अधिकतम ₹70 लाख, और टॉरिफ़िकेशन पर ₹28 लाख प्रति TPH, अधिकतम ₹1.4 करोड़ देता है — सिर्फ़ दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश के NCR ज़िलों की पराली पर। RBI ने पेलेट बनाने को प्राथमिकता क्षेत्र ऋण में रखा है, और SAMARTH की वेंडर सूची में नाम आने से बिजलीघरों के टेंडर तक पहुँच बनती है।
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कार्बन क्रेडिट के नाम पर गाँवों में क्या-क्या कहा जा रहा है, और असली प्रोजेक्ट को नक़ली से अलग कैसे पहचानें। पाँच सवाल, दो पक्के नियम, और वे बातें जिन पर तुरंत रुक जाना चाहिए।
कार्बन क्रेडिट क्या है? किसान के लिए सीधी और सच्ची बात
कार्बन क्रेडिट आसान भाषा में — यह है क्या, किसान को इससे सच में कितना पैसा मिल सकता है, कौन सी खेती इसमें आती है, और किन बातों पर भरोसा नहीं करना चाहिए।
मेरे पास 50 एकड़ ज़मीन है — क्या मैं अकेले कार्बन क्रेडिट कमा सकता हूँ?
50 एकड़ बहुत ज़मीन है। फिर भी अकेले अपना कार्बन प्रोजेक्ट चलाने के लिए यह कम पड़ती है — एक सूरत को छोड़कर। सीधा हिसाब, वह एक सूरत, और 50 एकड़ का इससे बेहतर इस्तेमाल।
Devendra Kumar Jha
LinkedIn ↗देवेंद्र, Agpro Consulting Private Limited के निदेशक हैं और AgriCarbon Credits का नेतृत्व करते हैं — जो इसकी सहयोगी संस्था और carboncreditconsulting.in की कृषि शाखा है। वे भारतीय किसानों, FPO, सहकारी समितियों और कृषि व्यवसायों को कार्बन प्रोजेक्ट परखने, बनाने और उनसे कमाई करने में मदद करते हैं।
- कृषि कार्बन प्रोजेक्ट डिज़ाइन और सलाह
- FPO, सहकारी समिति और कृषि व्यवसाय कार्यक्रम
- मिट्टी कार्बन, कृषि वानिकी और धान मीथेन

